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बिहार में एकीकृत खेती से किसानों को मिलेंगे बहुविध आय के स्रोत
गया स्थित दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय ने दो एकड़ कृषि भूमि पर एकीकृत खेती का प्रायोगिक मॉडल विकसित किया है। इस व्यवस्था में पशुपालन, मछली पालन और सब्जी-फल उत्पादन को एकसाथ संचालित किया जा रहा है।
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गया जिले में स्थित दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय ने कृषि क्षेत्र में एक अभिनव मॉडल प्रस्तुत किया है जो किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार ला सकता है। इस मॉडल के तहत दो एकड़ जमीन पर गाय, बकरी, मुर्गी, बतख, मछली के साथ-साथ विभिन्न फल और सब्जियों की खेती एक साथ की जा रही है।
इस एकीकृत खेती प्रणाली का मुख्य उद्देश्य किसानों को एकल फसल पर निर्भरता से मुक्त करना है। पारंपरिक कृषि में किसान प्रायः एक या दो फसलों पर ही आश्रित रहते हैं, जिससे मूल्य में उतार-चढ़ाव से उन्हें भारी नुकसान का सामना करना पड़ता है। एकीकृत खेती के इस तरीके से किसान को कई विकल्पों से आय प्राप्त करने का मौका मिलता है।
इस व्यवस्था में पशुधन से दूध, मांस और अंडे जैसी उपज मिलती है, जबकि मछली पालन से एक अतिरिक्त आय स्रोत बनता है। साथ ही, मौसमी सब्जियों और फलों की खेती से किसान को नियमित आमदनी का माध्यम मिलता है। विश्वविद्यालय के अनुसार, यह समन्वित कृषि पद्धति न केवल आय बढ़ाती है बल्कि भूमि की उर्वरता को भी बनाए रखने में सहायक है।
इस प्रायोगिक मॉडल को सफल मानते हुए कृषि विशेषज्ञ इसे बिहार के अन्य जिलों में भी लागू करने की संभावना जता रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि यह तकनीक छोटे और सीमांत किसानों की आर्थिक परिस्थिति में उल्लेखनीय सुधार लाने में मददगार साबित हो सकती है।