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अदृश्य जोखिम भी वास्तविक हैं, संस्थाएं नजरअंदाज करती हैं
जो जोखिम माप या वर्गीकरण में मुश्किल होते हैं, संस्थाएं उन्हें आसानी से अनदेखा कर देती हैं। यह उपेक्षा ही इन छिपे हुए खतरों को और भी घातक बना देती है।
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किसी भी संस्थान की सुरक्षा व्यवस्था केवल उन्हीं खतरों पर केंद्रित रहती है जिन्हें आसानी से पहचाना, मापा और वर्गीकृत किया जा सकता है। लेकिन वास्तविकता में सबसे बड़े जोखिम अक्सर वे होते हैं जो परंपरागत ढांचे के बाहर मौजूद रहते हैं और संस्थागत नजरिये से छिप जाते हैं।
ऐसे अदृश्य जोखिमों की समस्या यह नहीं है कि वे मौजूद नहीं हैं, बल्कि यह है कि संस्थाएं उन्हें स्वीकार करने या संबोधित करने में असमर्थ या अनिच्छुक रहती हैं। जब कोई खतरा मात्रात्मक रूप से व्यक्त नहीं किया जा सकता या वह मौजूदा प्रणालियों में फिट नहीं बैठता, तो संस्थाएं उसे नजरअंदाज करना पसंद करती हैं। यह रवैया दीर्घकालीन संकट का बीज बोता है।
व्यावसायिक, वित्तीय और सार्वजनिक क्षेत्र में यह समस्या विशेष रूप से गंभीर है। जलवायु परिवर्तन, सामाजिक प्रवृत्तियों में परिवर्तन, या आपूर्ति श्रृंखला में विघ्न जैसे कारक पारंपरिक जोखिम मॉडल में पूरी तरह नहीं आते। इसके बावजूद ये कारक भविष्य में सबसे विनाशकारी साबित हो सकते हैं।
संस्थाओं को अपनी सोच विस्तृत करनी चाहिए। केवल वही जोखिम महत्वपूर्ण नहीं हैं जो पारंपरिक मेट्रिक्स में मापे जा सकते हैं। जो कुछ भी दृश्य सीमा के बाहर है, उसके अस्तित्व को स्वीकार करना और उसके संभावित प्रभावों पर विचार करना आज के जटिल और अप्रत्याशित विश्व में संस्थागत सफलता के लिए अनिवार्य है।