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यूपीआई प्लेटफॉर्म को बिल भुगतान पर घाटा, शुल्क प्रतिबंध से आर्थिक दबाव
भारत की डिजिटल भुगतान कंपनियों का कहना है कि बड़े बिल भुगतान पर शुल्क प्रतिबंध के कारण उनकी आय खर्चों को कवर नहीं कर पाएगी। यूपीआई ऐप्स को प्रति लेनदेन मात्र एक रुपये की कमाई होगी जबकि भारत बिल भुगतान प्रणाली को अधिक कमीशन देना होगा।
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भारत की प्रमुख यूपीआई भुगतान एप्लिकेशनें बिल भुगतान सेवाओं में आर्थिक नुकसान झेलने का सामना कर रही हैं। नियामकीय निर्देशों के अनुसार प्लेटफॉर्म शुल्क लगाने पर प्रतिबंध लगाए जाने से इन कंपनियों की राजस्व क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हुई है।
वर्तमान व्यवस्था के तहत बड़े बिल भुगतान पर पांच रुपये के मर्चेंट डिस्काउंट रेट से यूपीआई प्लेटफॉर्म को मात्र एक रुपये का हिस्सा मिलता है। शेष राशि भारत बिल भुगतान प्रणाली को कमीशन के रूप में जाती है। इसके अतिरिक्त, छोटे लेनदेन से इन प्लेटफॉर्म को कोई आय नहीं मिलती।
इंडस्ट्री के विश्लेषकों का मानना है कि यह व्यवस्था यूपीआई ऐप्स के लिए आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं है। बिल भुगतान सेवाओं को संचालित करने में जो खर्च होता है, उससे कहीं कम आय ये कंपनियां प्राप्त कर रही हैं। नतीजतन, कई प्लेटफॉर्म इस सेवा को लेकर अपनी नीति पुनर्विचार करने के लिए बाध्य हो रहे हैं।
यह स्थिति भारत की डिजिटल भुगतान क्रांति के लिए एक चुनौती बनी हुई है, जहां नियामकीय मानदंड व्यावसायिक व्यवहार्यता के साथ संतुलन बनाने की जरूरत है। इस मुद्दे पर इंडस्ट्री एसोसिएशन और भारतीय रिजर्व बैंक के बीच विचार-विमर्श जारी है।