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कम पानी में ज्यादा रागी: 'गुली रागी' खेती को बढ़ावा देने के लिए ऑनलाइन कार्यक्रम
हवेरी जिले के किसानों ने 'गुली रागी' विधि अपनाकर परंपरागत तरीके से अधिक उपज प्राप्त की है। इस आधुनिक खेती पद्धति को लेकर 23 सितंबर को एक विशेष ऑनलाइन कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा।
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कर्नाटक के हवेरी जिले में 'गुली रागी' खेती की विधि से किसानों को उल्लेखनीय सफलता मिल रही है। इस तकनीक को अपनाने वाले किसान प्रति एकड़ लगभग 20 क्विंटल रागी की पैदावार हासिल कर रहे हैं, जबकि परंपरागत खेती से मात्र 15 क्विंटल का उत्पादन संभव है।
'गुली रागी' विधि का मुख्य लाभ यह है कि इसमें कम जल संसाधनों का उपयोग करके अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है। यह पद्धति सूखे इलाकों और जल की कमी वाले क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी साबित हुई है।
इस बेहतर खेती तकनीक को और व्यापक रूप से प्रचारित करने के लिए 23 सितंबर को एक ऑनलाइन कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यक्रम के माध्यम से किसानों को 'गुली रागी' खेती की विधि, उसके लाभ और व्यावहारिक पहलुओं के बारे में विस्तृत जानकारी दी जाएगी।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक को व्यापक स्तर पर अपनाने से न केवल किसानों की आय में वृद्धि होगी, बल्कि पानी जैसे मूल्यवान संसाधन की भी बचत संभव होगी। हवेरी जिले की सफलता के बाद अब यह विधि दक्षिण भारत के अन्य जिलों में भी अपनाई जा रही है।