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कमजोर मानसून ने भारत के बड़े हिस्सों को सूखा छोड़ा
चार महीने तक चलने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून का बुधवार को अंत हुआ, जो आमतौर पर भारत की वार्षिक वर्षा का 75 प्रतिशत होता है। इस बार मानसून की कमजोर कार्यप्रणाली से देश के विस्तृत क्षेत्र सूखे की समस्या का सामना कर रहे हैं।
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देश के कृषि और जल संसाधन क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण दक्षिण-पश्चिम मानसून इस बार अपनी सामान्य क्षमता से कम प्रदर्शन करता रहा है। चार महीने की अवधि में यह मानसून प्रणाली सामान्यतः भारत की कुल वार्षिक वर्षा का तीन-चौथाई भाग लाती है, लेकिन इस वर्ष इसकी कमजोर गतिविधि के कारण देश के कई हिस्सों में सूखा जैसी स्थिति बनी हुई है।
देश के विभिन्न कृषि क्षेत्रों में इस अपर्याप्त वर्षा का प्रभाव पड़ रहा है। मिट्टी की नमी की कमी से फसलों को सिंचाई के लिए अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता पड़ रही है। जलाशयों और भूजल स्तर पर भी इसका असर दिख रहा है, जहां पिछली सामान्य मानसून अवधि की तुलना में जल संचय में कमी दर्ज की गई है।
मानसून की यह कमजोर कार्यप्रणाली खरीफ सीजन की खेती के लिए चिंताजनक साबित हुई है। किसान अपनी फसलों के लिए वर्षा पर निर्भर हैं और इस अपर्याप्त वर्षा से उनकी उत्पादकता प्रभावित हो सकती है। सरकार के जल प्रबंधन विभाग मानसून के बाद की स्थिति में सूखा-प्रभावित क्षेत्रों की निगरानी जारी रखेंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की मानसून प्रणाली में विसंगति भविष्य के लिए चुनौतियां प्रस्तुत करती है। जलवायु परिस्थितियों में होने वाले बदलावों को देखते हुए, देश को जल संरक्षण और कृषि पद्धतियों में सुधार की आवश्यकता है ताकि ऐसी स्थितियों से बेहतर तरीके से निपटा जा सके।