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पश्चिमी घाट: मूल वनस्पति एक-तिहाई रह गई, जलीय चक्र प्रभावित
एक व्यापक समीक्षा में पश्चिमी घाट के पारिस्थितिक संकट का खुलासा हुआ है। दो सदियों के वृक्षारोपण, बांधों और बुनियादी ढांचे के विकास ने इस संवेदनशील क्षेत्र को गंभीर नुकसान पहुंचाया है।
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पश्चिमी घाट के पारिस्थितिकी तंत्र पर किए गए एक गहन विश्लेषण में चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। समीक्षा में पाया गया कि इस जैव विविधता समृद्ध क्षेत्र की मूल वनस्पति अब केवल एक-तिहाई रह गई है। साथ ही, क्षेत्र का जलीय चक्र और प्राकृतिक जल संरक्षण तंत्र गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है।
इस विनाश के लिए दो सौ वर्षों से अधिक समय तक चलने वाले वृक्षारोपण कार्यक्रम, बांधों का निर्माण और सड़क तथा बुनियादी ढांचे का विकास मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। ये गतिविधियां स्थानीय वनस्पतियों को विस्थापित करते रहे हैं और प्राकृतिक पारिस्थितिकी को नष्ट करते रहे हैं।
इन मौजूदा समस्याओं को अब जलवायु परिवर्तन के चरम मौसमी प्रभाव और विदेशी आक्रामक प्रजातियों का तीव्र प्रसार और भी गंभीर बनाए दे रहे हैं। इसके अलावा, शहरीकरण और नए बुनियादी ढांचे के विकास की योजनाएं पश्चिमी घाट पर अतिरिक्त दबाव डालती जा रही हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस क्षेत्र की पारिस्थितिक संरक्षा के लिए तत्काल और प्रभावी कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। भारत की जलवायु और जैव विविधता के संतुलन के लिए पश्चिमी घाट की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।