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दशहरे पर रावण दहन: शाम को पुतला जलाने की परंपरा का धार्मिक महत्व

दशहरे की परंपरागत प्रथा में रावण के पुतले का दहन सदियों से होता आया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अनुष्ठान को शाम के समय ही संपन्न किया जाता है।

LSN India · 20 October 2026

दशहरे पर रावण दहन: शाम को पुतला जलाने की परंपरा का धार्मिक महत्व

भारतीय संस्कृति में दशहरा बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। इस पर्व पर रावण दहन की परंपरा देश के विभिन्न हिस्सों में धूमधाम से मनाई जाती है। हालांकि, यह प्रश्न सदैव उठता है कि इस महत्वपूर्ण अनुष्ठान को दिन में नहीं, बल्कि शाम के समय ही क्यों किया जाता है।

धार्मिक विद्वानों और परंपरा के जानकारों के अनुसार, शाम का समय इस अनुष्ठान के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है। शास्त्रों में उल्लेख है कि रावण के पुतले को शाम को जलाने से बुराई का अंत और अंधकार का विनाश सुनिश्चित होता है। सांयकालीन समय में आकाश का रंग बदलना और सूर्यास्त की प्रक्रिया को प्रकृति का एक महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है।

इसके अतिरिक्त, शाम का समय सामूहिक उपस्थिति और भागीदारी के लिए भी सर्वोत्तम माना गया है। इस समय परिवार के सदस्य और समाज के लोग एकत्रित हो सकते हैं। रावण दहन को एक सामूहिक धार्मिक कर्मकांड के रूप में मनाने की परंपरा भारतीय मूल्यों और सामाजिक एकता को दर्शाती है। इसलिए शाम के समय का चयन इस महान परंपरा के संपूर्ण सांस्कृतिक अर्थ को जीवंत करता है।