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सरकारी उद्यमों में महिलाएं: विधायिकाओं से भी कम प्रतिनिधित्व
महिला आरक्षण विधेयक को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच सरकारी उद्यमों में महिलाओं की कम भागीदारी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में महिलाएं कुल कर्मचारियों का 10 प्रतिशत भी नहीं हैं।
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महिला आरक्षण विधेयक को लेकर विधायिका में चल रही बहस के बीच सरकारी उद्यमों में महिलाओं की नियुक्ति का सवाल एक और अधूरा रह गया है। नीति निर्माता और विशेषज्ञ केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (सीपीएसई) में महिलाओं के बेहद कम प्रतिनिधित्व को लेकर चिंतित हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में महिलाएं कुल कार्यबल का 10 प्रतिशत से भी कम हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि इनमें से 10 में से एक भी महिला पर्यवेक्षी स्तर तक पहुंच पाती हैं। यह स्थिति निजी क्षेत्र से काफी अलग है, जहां लगभग एक-चौथाई महिलाएं प्रबंधकीय पदों पर कार्यरत हैं।
विभिन्न सर्वेक्षणों के अनुसार, निजी क्षेत्र में प्रवेश स्तर की नौकरियों में महिलाओं का अनुपात एक-तिहाई तक पहुंचता है। इसके विपरीत, देश में कुल महिला श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) 34 प्रतिशत से कम है, जो वर्ष 2024-25 के अंत में 40 प्रतिशत से गिरकर यह स्तर पर आई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में महिलाओं के लिए अवसर बढ़ाने से न केवल लैंगिक समानता को बल मिलेगा, बल्कि इन संगठनों की कार्य क्षमता में भी सुधार होगा। सरकार को इस क्षेत्र में ठोस नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता है।